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Wednesday, 8 March 2017

               बाबा मस्तनाथ मठ मेला 2017 





Saturday, 19 October 2013

                                                     नाथ सिद्ध योगी राज बाबा मस्तनाथ जी                                                   
योगिराज मस्तनाथ उच्चकोटि के नाथ योगी थे अतेव उन्हें नाथ सिद्ध कहना सर्वथा युक्ति संगत है   नाथ सम्प्रदाय में ही नहीं केवल मात्र योगसिधों में ही नहीं समग्र भारतीय अध्यात्मसाधना के छेत्र में वे मध्यकाल के दूसरे-तीसरे चरन की संधि अवधि के महान तपस्वी और योगपुरुष के रूप में सम्मानित हैं अपने पंचभौतिक शरीर में महाराज पूरे सौ साल तक विद्यमान थे। उनके समय में दिल्ली की राजसत्ता औरन्गजेब की धार्मिक कट्टरता सूबेदारों की स्वाधीनता बिदेशी आक्रमणों की विनाशलीला तथा यूरोपिय कंपनीयों के पारम्परिक राजनैतिक सत्ता हतियाने के षडयंत्र के परिणाम स्वरूप कमजोर होती जा रही थी नादिरसाह और अहमद्साह दुर्रानी के आक्रमण से देश का एक विशाल भाग विशेषस्वरूप से पश्चिमोत्तर प्रान्त पंजाबहरयाणा आदि प्रदेश जर्जर हो रहे थे ।

औरन्गजेब की १७०७ ई. में मृत्यु हुई ठीक उसी संवत में मस्तनाथ जी महाराज ने धर्म के संरक्षण के लिए अभिनव गोरक्ष नाथ रूप में जन्म लेकर अपने दिव्य कर्म का अच्छी तरह संपादन किया राजस्थान पंजाब और हरयाणा तथा दिल्ली और उत्तरप्रदेश के भूमि भाग उनके दिव्य जन्म कर्म से विशेष रूप से गौरवान्वित हो उठे। महाराज ने नाथयोग के प्रचार-प्रसार और गोरक्षनाथ जी के योग्सिद्धान्तों के प्रतिपादन में बड़ी महान भूमिका निभाई महाराज ने शिवाजी समर्थ रामदास तथा गुरु गोविन्द सिंह की हिंदुत्व भावना से प्रभावित असंख्य लोगों को अपने दिव्य व्यक्तित्व से जागृत और सत्पथ में अनुप्राणित किया। योगिराज चौरन्गीनाथ की योगसाधना और तपस्या की स्थली के रूप में गौरवान्वित हरयाणा का अस्थल बोहर मठ मस्तनाथ की गरिमा का सजीव भौम स्मारक है

इन्द्रप्रस्थचंडीगढ़रोहतक आदि भूमि भाग को हरयाणा प्रदेश कहा जाता है। हरयाणा के रोहतक क्षेत्र के संग्राम गाँव में एक धनि वैश्य परिवार में सिद्ध बाबा मस्तनाथ जी अवतरित हुए यह वैश्य जाती रेवारी जाती के नाम से प्रसिद्ध है। इस परिवार के सबला नाम के व्यक्ति निस्संतान थे वे बड़े श्रद्धालु और भगवद्भक्त थे एक दिन यमुना नदी तट पर अमृतकाय शिवगोरक्ष महायोगी शिवगोरक्ष नाथ जी ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दियाउनकी जटासुनहले रंग की थी हाथ मैं वीणा थी दोनों कान में तेजोमय कुंडल थे। सबला ने उनसे पुत्र प्राप्ति का वरदान माँगा। गोरक्ष नाथ जी वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। १७६४ वि. मैं शिवपूजन के अवसर पर एक वन में वट वृक्ष के निचे सबला और उसकी स्त्री को एक वर्ष के दिव्य बालक के रूप में आकारित मस्तनाथ की प्राप्ति हुई।माता- पिता ने उनका विधिपूर्वक जन्म संस्कार कियापुत्र का उनोहने धूम-धाम से जन्मोत्सव मनाया। मस्तनाथ की उत्पत्ति दिव्य थी अयोनिज थीनिसंदेह यह महायोगी गोरक्षनाथ के दर्शन और अनुग्रह का ही मांगलिक परिणाम-फल था।

बाबा मस्तनाथ जी की बाल लीलाएं
दस साल की अवस्था में मस्तनाथ को गृहकार्य में सहज अरुचि होने लगी और वे बालकों के साथ खेला करते थे उनकी उदासीनता को दूर करने के लिए माता-पिता ने उन्हें गोपालन में प्रवृत किया बालकों को उनके साथ वन में जाकर गाय चराने में बड़ी प्रसन्नता होती थी।धीरे-धीरे उनकी लोकोत्तर लीलालें आरम्भ हुई। वन में वे गाय चराने जाते थे बालकों के साथ खेलते थे और ठीक उसी समय गाँव में अपने साथियों के साथ क्रीडामग्न हो जाते थे। यह बात अधिक दिनों तक छिपी न रही। कभी-कभी गाय चराने के लिए उन्हें वन में भेजकर पिता उन्हें गाँव के लड़कों के साथ खेलते देखकर आश्चर्य में पड़ जाते थे। सोचते थे की मस्तनाथ का मन गाय चराने में नहीं लगता लेकिन आश्चर्य बढ़ जाता था जब ऐसी हालत में गाय वन में ही चर रही होती थीं। वे एक दिन स्वयं वन में गए तो देखा की मस्तनाथ गो पालन में लगे है और गाँव वापस आते ही उन्हें वहीं देखा तो कुछ भी समझ में नहीं आया। सबला उन्हें साक्षात् गोरक्ष नाथ जी के अनुग्रह से प्राप्त समझ कर उनके प्रति अमित पूज्यभाव रखते थे और उनके हृदय में मस्तनाथ के प्रति आदर सात्विक स्नेह बढ़ता रहता था।

वैराग तथा योगी ब्रह्मण को अपने रूप से अवगत कराना
बारह साल की अवस्था होने पर मस्तनाथ के मन पर वैराग का रंग चढ़ने लगा। वे नदी तट पर वन में और तालाबके रमणीय किनारे-किनारे विचरण कर एकांत का सेवन करते हुए आत्मचिंतन में लग गए कभी-कभी किसी गुफा में बैठ कर शांतवृति में रमण करने लगते थे। वे इच्छाचारी मिताहारी और ब्रहमचारी के रूप में जीवन यापन में प्रवृत हुए। माता पिता ने उनके पालन पोषण और देख-रेख में किसी भी तरह की कमी नहीं रखी। मस्तनाथ के घर के ही समीप एक नैष्ठिक ब्राहमन निवास करते थे जप धियान आदि में लीन होकर वे भगवन का चिंतन किया करते थे। उन्हें मस्तनाथ ने अपनी योगविभूति का दर्शन कराया। उन्होंने जटा विभूति विभूषित गले में सेली आदि शोभित उनका युवा अवधूत वेश में दर्शन किया। साथ ही साथ उन्हें मस्तनाथ के दर्शन के अतिरिक्त अनेक योगियों का भी दर्शन होने लगा। ब्रह्मण ने यह बात उनके पिता से कही पिता मस्तनाथ के दिव्यस्वरूप में निष्ठावान थे उन्होंने उनसे (मस्तनाथ से) पूछा की ब्रह्मण को दर्शन देने वाले योगी कौन हैं। पिता ने दैवी सिद्धिसमपन्न मस्तनाथ जी की महिमा का अनुभव किया ।

गुरु दीक्षा
एक दिन उनके निवास पर आइपंथ के प्रसिद्ध संत नरमाई का आगमन हुआ पिता ने उनके चरण पर मस्तनाथ को अदृश्य विधान से समर्पित कर दिया। मस्तनाथ ने कहा की मुझे श्री नाथ जी की सेवा में समर्पित कीजिये में आपके शरणागत हूँ नरमाई ने कहा की परमेश्वर का चिंतन ही परम आवश्यकतत्व है विषयासक्त न रहने पर ही वास्तविक विरक्ति का उदय होता है नरमाई ने मस्तनाथ को २४ साल की अवस्था में संवत १७८८ वि. में योग मंत्र की दीक्षा देकर शिष्य रूप में स्वीकार किया। मस्तनाथ आई पंथ में दीक्षित होकर कुंडल धारण कर साधना में प्रवृत हो गए।

आई पंथ
आई पंथ का सम्बन्ध करकाई और भुसटाई पंथ से बताया गया है दोनों गोरक्ष नाथ जी के शिष्य थे। आई पंथ में आदि शक्ति-आई (माता मराठी भाषा में आई माता को कहते हैं) की पूजा करने से अनुयाइयों को आई पंथी कहा गया है। गोरक्षनाथ जी की शिष्या विमला को इस पंथ की मूल प्रवर्तिका मन गया है। नित्यान्हिक तिलक में विमला को मत्स्येन्द्र नाथ की अनुवर्तनी कहा गया है इसलिए यह संभावना पुष्ट होती है की विमला ने गुरु गोरक्ष नाथ जी से दीक्षा प्राप्त की है। मस्तनाथ जी के गुरु नरमाई जिन्द के कोट स्थान में उत्पन्न हुए थे मस्तनाथ जी के समय से आई पंथ के योगियों ने अपने नाम के साथ नाथ लगाना आरम्भ किया। नाथ योगी मस्तनाथ इस पंथ में एक सिद्ध पुरुष के रूप में प्रख्यात हुए।

बाबा मस्तनाथ जी का अस्थल बोहर आना और विकलांगों को ठीक करना।
योगिराज मस्तनाथ ने हरयाणा प्रदेश के बोहर से सटे वन को अपना तप:स्थल चुनाजिसकी प्राकृतिक रमणीयता और नीरवता से आक्रीष्ट होकर योगिराज चौरंगी नाथ ने पधार कर तप किया था। मस्तनाथ जी ने पंचाग्नि तप के लिए धूनी प्रज्वलित की। असंख्य दर्शनार्थी उनकी योगसिद्धि और तपस्या से प्रभावित होकर उमड़ पड़े। महाराज ने इसे योग साधना मैं बाधक समझ कर उसी वनस्थली से थोडा आगे स्थान पर तप करने करने का निश्चय किया अनेक लोग उनके दर्शन से सफल मनोरथ होने लगे उनके मार्गदर्शन से लोगों को स्वस्थता शांति और निर्भय की प्राप्ति हुई तपस्या की इस अवधि में एक पंगु नारी आई। लोगों ने उसकी कुरूपता की हंसी उड़ाई।महाराज के अनुग्रह से वह नारी सुंदर आकृति में बदल गई और उसकी पंगुता नष्ट हो गई। इसी तरह बोहर ग्राम के ही निर्भय शर्मा के पुत्र नाथूराम शर्मा को महाराज के दर्शन के लिए उपस्तिथ होने पर नेत्र ज्योति मिल गई। वह दिव्य दृष्टी से सम्पन्न हो उठा। अनेक विकलांग और अंगहीनो विकलांगता ठीक हो गई उनके अंग प्रत्यंग ठीक हो गए।

शिष्यों को पूर्व की घटना सुनना
योगिराज मस्तनाथ साक्षात तीर्थस्वरूप थे वे आत्मतीर्थ थे।यद्यपि उनके लिए तीर्थ भ्रमन की आवश्यकता न थी तथापि तीर्थों मैं उनकी उपस्तिथि से लोग अपने आपको मन वचन और शरीर से शुद्ध अनुभव करते थे उन्होंने एक वन की गुफा में तप के लिए प्रवेश किया। एक दिन जोर से अट्टहास किया शिष्यों ने कारण पुछा तो कहा की निकटस्थ गाँव में एक कर्कशा स्त्री रहती है। वे शिष्यों के साथ भिक्षाटन के लिए आये। वह स्त्री वस्त्र प्रक्षालन के लिए एक वर्तन में पानी गर्म कर रही थी उन्होंने उस कुम्हार की स्त्री से भिक्षा में एक घड़ा और स्थाली की याचना की उसने महाराज के सामने वर्तन को गर्म जल सहित भेज दिया। उनके शाप से शाप से पूरे का पूरा गाँव नष्ट हो गया।

शीलका को चमत्कार दिखाना
मस्तनाथ की तपस्या और जीवनवृत्ति योग के अमृत से रसमयी है। एक दिन महाराज मस्तनाथ सिद्धासन लगाकर वन मैं एक वृक्ष के निचे ताप में लीन थे की भालो ग्राम का शीलका नामक व्यक्ति उनकी सेवा में दूध ले आया और नित्य दूध लाकर बाबा की सेवा में लगा रहता था। महाराज ने उसे जंगली जानवरों से सावधान कर वन में आने से रोकना चाहा तो उसने कहा की मुझे चोरादी से तथा जंगली जन्वेरों से भय नहीं लगता। एक दिन महाराज ने उसके वस्त्र चोर के रूप में प्रकट होकर छीन लिए और उसका रूप बनाकर रात ही में उसकी माँ को वे वस्त्र वापस कर लौट आये। सवेरे शीलका ने घर पहुँच कर देखा की सारे वस्त्र घर पर हैं। माँ ने कहा की तुम्ही ने वस्त्र वापस किया है।सभी लोग महाराज की योग सिद्धी से चकित हो गए।

एक दिन आधी रात में पेड़ पर बैठ कर शीलका ने देखना चाहा की महाराज इस समय कहाँ जाकर अद्रिस्य हो जाते है उसने देखा की महाराज सिद्ध गन्धर्वों और योग सिद्धों के बीच में स्थित हैं और सभी लोग उनकी आरते कर रहे हैं। इस दृश्य को देखकर वह आश्चर्य में पड़ गया उसने महाराज से योगदिक्षा ली उसके पुत्र ने भी शिष्यत्व ग्रहण किया और पत्नी योगिनी हो गई शीलका को महाराज ने शील्कानाथ नाम प्रदान किया।

बाबा मस्तनाथ द्वारा योगराज को भर्तरिहरी और गोपीचंद का दर्शन कराना
उस वन से मस्तनाथ ने एक अत्यंत निर्जन वन मैं प्रवेश किया।यह वन खोखरा कोट के नाम से प्रसिद्ध है तथा अस्थल बोहर के वन का ही एक भाग है। इस पर उनके प्रिये शिष्य योगराज ने कहा की आप सब कुछ करने मैं समर्थ हैं। सिद्धियों के स्वामी हैं। मृत को जीवित करने वाले हैं और विरक्त को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। मेरी इच्छा है की मैं कालदंड का खंडन कर सिद्ध देह में विचरण करने वाले अमरकाय भर्तरिहरी और गोपीचंद का प्रत्यक्ष दर्शन करू। मस्तनाथ ने कहा की यद्यपि आत्मा अमर है तथा अपि योग्सिधान्त में आत्मा के साथ शारीर अमर हो जाता है भर्तरिहरी और गोपीचंद दोनों अमर हैं। मस्तनाथ जी के अनुग्रह से दुसरे दिन सवेरे योगराज को भर्तरिहरी और गोपीचंद का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ।

बाबा मस्तनाथ जी द्वारा सूखे वृक्ष को हरा करना और जाट को पुत्र प्राप्ति होना
मस्तनाथ जी ने पटियाला राज्य के उचाना ग्राम मैन्कुच समय तक निवास कर लोगों को योगोपदेश दिया सिद्धों की महिमा और योगसाधना प्रक्रिया से परिचित कराया। रोहतक मंडल में महम ग्राम के निकट घडी बढ़ी ग्राम में एक सूखे प्राचीन वट वृक्ष के निचे आसन लगाया।एक वृद्ध जाट धर्मात्मा पुरुष संतानहीनता से वह बहुत दुखी था उसकी स्त्री भी शरीर से जर्जर हो चली थी लोगों ने कहा की यदि यह सुखा वट वृक्ष हरा हो जाये तो जाट भी पुत्र की प्राप्ति कर सकता है महाराज के आदेश से शिष्यों ने वृक्ष के मूल मैं पानी डाला और वह हरा हो गया जाट ने उनके अनुग्रह से तीन वर्षों मैं तीन पुत्रों की प्राप्ति की।

पाई देवी को शाप देना
महाराज रोहतक मंडल के ही भालोट ग्राम से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित कलोई ग्राम मैं पहुँच गए। वहां कुईं पर पानी लेने आई हुई एक सुंदर नवजवान स्त्री ने अपनी सखिओं के साथ मिलकर मस्तनाथ जी के योगी वेश पर हास्यात्मक व्यंग किया वह हरिसिंह नामक व्यक्ति की पत्नी थी महाराज ने उसे शाप दिया की तू योगिनी होगी। उस स्थान को नीरस समझ कर महाराज ने निर्जन जीव जंतु के प्रवेश से अगम खोखर जंगल मैं निवास किया। घर जाने पर हरिसिंह की स्त्री पाई भूतावेश से ग्रस्त हो गई वह विकृति को प्राप्त हुई। उसके मन में वैराग का उदय हो गया वह अपने पति पुत्र आदि से सम्बन्ध विच्छेद कर तथा शरीर को भस्म विभूषित कर शिवगोरक्ष मन्त्र को स्मरण करती हुई उसने वन में प्रवेश किया। जब हरिसिंह को पता चला की यह मस्तनाथ के कोप का परिणाम है तो धनुष बाण लेकर उन्हें मारने चल पड़ा। महाराज आसन पर विराजमान थे अद्रिस्य हो गए कभी दीख पड़ते कभी अद्रिस्य हो जाते। हरिसिंह ने महाराज से क्षमा मांगी मस्तनाथ जी ने उसकी स्त्री को योगदीक्षा दी और यह पाई नाथ के नाम से महातपस्विनी योगिनी के रूप में प्रसिद्ध हो गई।

बाबा मस्तनाथ का मृग रूप धारण करना
खोखरा जंगल मैं ही योगिराज मस्तनाथ जी की कृपा से एक गोपालक की प्रार्थना से मृत गाय के शरीर मैं फिर से प्राण संचार हो गया। इसी प्रकार एक समय महाराज ने रोहतक के झज्जर ग्राम मैं आसन लगाया। महाराज की चरण धूलि से वह ग्राम पवित्र हो गया एक दिन वे छायादार वृक्ष के निचे विराजमान थे की एक सामंत आखेट के लिए उस वनस्थली मैं आया। महाराज ने मृग रूप धारण कर लिया। उसने महाराज पर बाण चलाया और मृग के स्थान पर उसने वट वृक्ष के निचे जटाजूट विभूषित योगी को देखा। महाराज के चरणों पर गिरकर उसने क्षमा मांगी महाराज ने उसे आत्मज्ञान से संबोधित किया।

बादशाह आलम को चमत्कार दिखाना
योगिराज मस्तनाथ ने अपनी चरणधूलि से दिल्ली को भी पवित्र किया था। बादशाह औरन्ग्जेब की धार्मिक कट्टरता से हिंदुत्व को भी आघात लगा था। उन दिनों दिल्ली के सिंघासन पर बादशाह आलम विराजमान था महाराज के दिल्ली पधारने से हिन्दुओं को बहुत आश्वासन मिला और महाराज ने उन्हें अभय दान दिया महाराज ने दिल्ली में पच कूईयां (पंच्कूपी) के समीप एक उद्यान मैं आसन लगाया शाह आलम उनका दर्शन करना चाहता था उसने महाराज के चरण-देश मैं शाल आदि बहुमूल्य पदार्थ उपहार मैं भेजे। महाराज ने कौतुक मैं ही उनको आग की धूनी मैं डाल दिया  बादशाह ने मंत्री भेजकर कहलवाया की जो वस्तुएं भेजी थीं वे आपके उपयोग मैं नहीं आयंगी उन्हें लौटा दें बदले में दूसरी वस्तु भेज रहा हूँ। महाराज ने धूनी में जले पदार्थ ज्यों के त्यों नवीन रूप में निकाल कर वापस कर दिए लोग उनकी योगसिद्धि से चकित हो गए। उन दिनों दिल्ली की स्थिति शोचनीय थी। गुलाम कादिर रूहेला ने शाह आलम को अँधा कर कैद में डाल दिया। १७८८ ई. में इस तरह दिल्ली असहाय हो गई। महाराज ने दिल्ली से प्रस्थान कर दिया।

पचोपा गाँव को शाप से नष्ट करना
दिल्ली से योगिराज पचोपा ग्राम आये। उस गाँव मैं देविदास नाम का एक व्यक्ति अपने तंत्र-मंत्रात्मक प्रयोग के लिए प्रसिद्ध था। उसने कहा की ऐसे अनेक योगी घुमते है इनमे सिद्धि नाममात्र को नहीं होती है उसने योगिराज की निंदा की महाराज मौन थे उन्होंने श्रद्धालुओं से सामान लेकर गाँव से बाहर जाने का आदेश दिया और कहा की यह गाँव आग लगने से शीघ्र ही जल उठेगा सिद्ध की वाणी थी। तत्काल सारा गाँव आग में प्रज्ज्वलित हो उठा।

कडाहे में काठ का टुकड़ा डलवाना और उसका स्वर्ण में बदलना
एक समय भ्रमण करते हुए योगिराज मस्तनाथ बीकानेर गए। उन दिनों महाराज गजसिंह के पुत्र सूरतसिंह बीकानेर के सिंघासन पर विराजमान थे। महाराज एक यज कर रहे थे उसमें दूर दूर के संत महात्मा साधू संत और विद्वान पधार रहे थे। यज्ञ के परिसर से ही महाराज मस्तनाथ अपने शिष्य रूप नाथ के साथ जा रहे थे की उन्होंने दूध से भरा कड़ाहा देखा उसमें उन्होंने विभूति और काठ का टुकड़ा प्रदान कर रूपनाथ को आदेश दिया की कड़ाहा में डाल दो। इससे यज्ञ क्षेत्र मैं बड़ा कोलाहल हुआ।

मस्तनाथ जी ने वन में आकर आसन लगाया राजा इस वृतांत से कुपित हुए और सिद्ध मस्तनाथ को लाने के लिए दूत भेजा। दूत ने कभी मस्तनाथ को देखा और कभी उनके स्थान पर सिंह देखा। राजा ने यह वृतांत जान कर उन्हें आदर पूर्वक राजमहल में बुलाया। उन्होंने महाराज से कडाह में विभूति और काठ का टुकड़ा डलवाने का कारन पूंछा तो योगिराज ने कहा की आप ब्राह्मणों को पायस का भोजन करा रहे थे तो दक्षिणा मैंने देना उचित समझा। कडाह मंगवाया तो उसमें स्वर्ण भरा हुआ था। राजा सूरत सिंह ने महाराज से नाथ योग की दीक्षा ग्रहण की और सेवा में एक ग्राम देना चाहा पर महाराज ने अस्वीकार कर दिया। उनके शिष्य तोतानाथ प्रसिद्ध हुए और सूरत सिंह ने सेवा में एक ग्राम थेडी नामक प्रदान कर बोहर मठ के अधिकार में कर दिया।

रूप नाथ की स्त्री को स्वर्ण से भरा मतीरा देना
रूपनाथ की विवाहिता स्त्री जो उनके शिष्य होने के पहिले विवाहिता थी महाराज का दर्शन करने आई जीविका के लिए महाराज ने मतिरा दिया जो बहुमूल्य मोतियों से परिपूर्ण था। महाराज ने उसकी चिंता नष्ट कर दी।

बाबा मस्तनाथ जी द्वारा राजा मानसिंह को राजा बनाना
महायोगी जलंधरनाथ के कृपापात्र जोधपुर के महाराज मानसिंह को राज्य अधिकारी बनाने में उनके समकालीन योगिराज मस्तनाथ का ही विशेष योगदान था क्यूंकि जालान्धरनाथ के प्रति महाराज के हृदय में श्रद्धा रही होगी लेकिन विशेष रूप से नाथयोगी और नाथ सम्प्रदाय के प्रति उनमें श्रद्धा निष्ठा की जाग्रति मस्तनाथ जी के अनुग्रह के रूप मैं ही स्वीकृत है। मानसिंह के भाई भीम सिंह बहुत कठोर हृदय के थे। उन्होंने मानसिंह को जालोर दुर्ग मैं बंदी बनाकर जोधपुर के राज्य पर अधिकार कर लिया था।

मस्तनाथ ने जोधपुर पहुँच कर एकांत मैं आसन लगाया। मानसिंह के दूत के रूप में एक कुंडलधारी दर्शनी योगी ने भीमसिंह को सूचित किया की मानसिंह की रक्षा करने के लिए एक सम्रर्थ योगी आ गए हैं। वे सिद्ध हैं मृतक को जीवन दान देने वाले हैं साथ ही साथ महाराज ने योगबल से भीमसिंह के किसी मुख्य सैनिक को मानसिंह के पास भेजा की भीमसिंह सात दिनों के भीतर राज्य पर अधिकार कर लेंगे आप खजाना सुरक्षित कर राज्य के बहार निकल जाएये। मानसिंह चिंतित हो उठे। उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी की आप तीसरे दिन जोधपुर के राजा बन जायेंगे। मानसिंह ने कहा की यह कहने वाले आप कौन हैं जालंधर नाथ हैं मत्स्येंदर नाथ हैं या गोरक्षनाथ हैं हमें दर्शन दीजीये। आप मस्तनाथ तो नहीं हैं मस्तनाथ प्रकट हो गए महाराज ने कहा की इस कोट मैं एक कूप है उसका जल पीजीए एक अन्न का भंडार है सारी सेना की इसी से तृप्ति हो जाएगी।

मस्तनाथ अंतर्ध्यान हो गए। उसके बाद मस्तनाथ ने मंदिर मैं प्रकट होकर जलंधरनाथ के पूजक देवनाथ से कहा की भीम सिंह स्वयं मृत हो जायेगा मानसिंह से कहना चाहिए भीमसिंह के मरने पर मानसिंह मस्तनाथ जी के अनुग्रह पर जोधपुर के राजसिंघासन पर आसीन हो गए। सम्पूर्ण राज्य की मानसिंह ने श्रीनाथ जी की धरोहर के रूप मैं स्वीकार किया और मस्तनाथ जी को आदर पूर्वक राजमहल मैं पधारवा कर उनसे धर्म और योगतत्त्व का उपदेश प्राप्त किया। मानसिंह नाथ योग के अद्भुत मर्मज्ञ थे। उनकी श्रीनाथतीर्थावाली रचना विशेष रूप से नाथ सम्प्रदाय मैं सम्मानित है। विवेकमार्तनड के टीकाकार तथा उन्ही के समकालीन और कृपापात्र भीष्म भट्ट ने मानसिंह को सिद्धसिद्धांतत्तत्वज्ञ और श्रीनाथपदामभोजमधुप कह कर सम्मानित किया है। जोधपुर राज पुस्तकालय के एक भाग के रूप में नाथ सम्प्रदाय परक अगणित पुस्तकों का भंडार महाराज मानसिंह की देन है।

बाबा मस्तनाथ जी के शिष्य और उनको दिया उपदेश
सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी की शिष्य परम्परा बड़ी समृद्ध है। उनके शिष्य घडी नाथ धाता और रनपत तथा तोता नाथ आदि के नाम विशेष सम्मानित हैं। तोता नाथ भरतपुर क्षेत्र के पिगोरा ग्राम के रहने वाले थे महाराज का उन पर विशेष अनुग्रह था। बीकानेर राज्य से प्राप्त थेडी ग्राम महाराज ने तोतानाथ को देखभाल के लिए सोंपा था। मस्तनाथ जी ने शिष्यों को उपदेश दिया की आत्मतत्व का ज्ञान प्राप्त करना ही योगसाधना का फल है। व्यव्हार-मार्ग का त्याग नहि कारना चाहिए। सदाचार परक व्यव्हार की सिद्धि में ही परमार्थ सन्निहित है। उन्होंने कहा की आत्मतत्व साकारस्वरूप मायावश सातिशय होता है । वास्तव मैं वह निरतिशय निर्गुण है।

बाबा मस्तनाथ जी का महाप्रस्थान
एक समय बाबा मस्तनाथ जी महाराज बीघडान गाँव में विराजमान थे। उन्होंने बात ही बात में शिष्य मंडली से अपने महाप्रस्थान की बात बताई की फाल्गुन शुक्ल पक्ष में यह यात्री स्वधाम चला गायेगा। महाराज शिष्यों को उपदेश दे रहे थे की वार्ता के मध्य में अमरकाया सिद्ध योगिराज चौरंगी नाथ ने आकर भेंट की परस्पर में बातचीत कर अंतर्ध्यान हो गए। योगिराज मस्तनाथ ने पूरे सौ साल की अवस्था में संवत १८६४ वि. की फाल्गुन शुक्ल नौमी को निर्वाण प्राप्त किया।

महाराज ने दिव्या देह से प्रकट हो कर आकाश से कहा में जीवीत हूँ मृत नहीं हूँ। स्थूल देह मात्र से ही मेरा सम्बन्ध विच्छेद हुआ है । अत्यंत सादे ढंग से जमीन में गुफा बनाकर उसमें मेरे शरीर को समाधी दी जायउनके आदेश से शरीर को बीघडान गाँव से अस्थल बोहर लाया गया और चौरंगी नाथ जीकी स्थली में ही उन्हें समाधी दी गई। उनके शिष्य तोता नाथ जी ने सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी के समाधी स्थल पर एक मंदिर का निर्माण कराया। मस्तनाथ जी के समाधी स्थल पर फाल्गुन शुक्ल नौमी को प्रत्येक वर्ष मेला लगता है। अस्थल बोहर का कण कण उनकी योगसिद्धि का परिचायक है। योगिराज मस्तनाथ अमर हैं उनकी पवित्र कीर्ति अमर है।
आदेश आदेश आदेश

Thursday, 17 October 2013

नाथ सिद्ध योगी राज बाबा मस्तनाथ जी
योगिराज मस्तनाथ उच्चकोटि के नाथ योगी थे अतेव उन्हें नाथ सिद्ध कहना सर्वथा युक्ति संगत है   नाथ सम्प्रदाय में ही नहीं केवल मात्र योगसिधों में ही नहीं समग्र भारतीय अध्यात्मसाधना के छेत्र में वे मध्यकाल के दूसरे-तीसरे चरन की संधि अवधि के महान तपस्वी और योगपुरुष के रूप में सम्मानित हैं अपने पंचभौतिक शरीर में महाराज पूरे सौ साल तक विद्यमान थे। उनके समय में दिल्ली की राजसत्ता औरन्गजेब की धार्मिक कट्टरता सूबेदारों की स्वाधीनता बिदेशी आक्रमणों की विनाशलीला तथा यूरोपिय कंपनीयों के पारम्परिक राजनैतिक सत्ता हतियाने के षडयंत्र के परिणाम स्वरूप कमजोर होती जा रही थी नादिरसाह और अहमद्साह दुर्रानी के आक्रमण से देश का एक विशाल भाग विशेषस्वरूप से पश्चिमोत्तर प्रान्त पंजाबहरयाणा आदि प्रदेश जर्जर हो रहे थे ।

औरन्गजेब की १७०७ ई. में मृत्यु हुई ठीक उसी संवत में मस्तनाथ जी महाराज ने धर्म के संरक्षण के लिए अभिनव गोरक्ष नाथ रूप में जन्म लेकर अपने दिव्य कर्म का अच्छी तरह संपादन किया राजस्थान पंजाब और हरयाणा तथा दिल्ली और उत्तरप्रदेश के भूमि भाग उनके दिव्य जन्म कर्म से विशेष रूप से गौरवान्वित हो उठे। महाराज ने नाथयोग के प्रचार-प्रसार और गोरक्षनाथ जी के योग्सिद्धान्तों के प्रतिपादन में बड़ी महान भूमिका निभाई महाराज ने शिवाजी समर्थ रामदास तथा गुरु गोविन्द सिंह की हिंदुत्व भावना से प्रभावित असंख्य लोगों को अपने दिव्य व्यक्तित्व से जागृत और सत्पथ में अनुप्राणित किया। योगिराज चौरन्गीनाथ की योगसाधना और तपस्या की स्थली के रूप में गौरवान्वित हरयाणा का अस्थल बोहर मठ मस्तनाथ की गरिमा का सजीव भौम स्मारक है

इन्द्रप्रस्थचंडीगढ़रोहतक आदि भूमि भाग को हरयाणा प्रदेश कहा जाता है। हरयाणा के रोहतक क्षेत्र के संग्राम गाँव में एक धनि वैश्य परिवार में सिद्ध बाबा मस्तनाथ जी अवतरित हुए यह वैश्य जाती रेवारी जाती के नाम से प्रसिद्ध है। इस परिवार के सबला नाम के व्यक्ति निस्संतान थे वे बड़े श्रद्धालु और भगवद्भक्त थे एक दिन यमुना नदी तट पर अमृतकाय शिवगोरक्ष महायोगी शिवगोरक्ष नाथ जी ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दियाउनकी जटासुनहले रंग की थी हाथ मैं वीणा थी दोनों कान में तेजोमय कुंडल थे। सबला ने उनसे पुत्र प्राप्ति का वरदान माँगा। गोरक्ष नाथ जी वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। १७६४ वि. मैं शिवपूजन के अवसर पर एक वन में वट वृक्ष के निचे सबला और उसकी स्त्री को एक वर्ष के दिव्य बालक के रूप में आकारित मस्तनाथ की प्राप्ति हुई।माता- पिता ने उनका विधिपूर्वक जन्म संस्कार कियापुत्र का उनोहने धूम-धाम से जन्मोत्सव मनाया। मस्तनाथ की उत्पत्ति दिव्य थी अयोनिज थीनिसंदेह यह महायोगी गोरक्षनाथ के दर्शन और अनुग्रह का ही मांगलिक परिणाम-फल था।

बाबा मस्तनाथ जी की बाल लीलाएं
दस साल की अवस्था में मस्तनाथ को गृहकार्य में सहज अरुचि होने लगी और वे बालकों के साथ खेला करते थे उनकी उदासीनता को दूर करने के लिए माता-पिता ने उन्हें गोपालन में प्रवृत किया बालकों को उनके साथ वन में जाकर गाय चराने में बड़ी प्रसन्नता होती थी।धीरे-धीरे उनकी लोकोत्तर लीलालें आरम्भ हुई। वन में वे गाय चराने जाते थे बालकों के साथ खेलते थे और ठीक उसी समय गाँव में अपने साथियों के साथ क्रीडामग्न हो जाते थे। यह बात अधिक दिनों तक छिपी न रही। कभी-कभी गाय चराने के लिए उन्हें वन में भेजकर पिता उन्हें गाँव के लड़कों के साथ खेलते देखकर आश्चर्य में पड़ जाते थे। सोचते थे की मस्तनाथ का मन गाय चराने में नहीं लगता लेकिन आश्चर्य बढ़ जाता था जब ऐसी हालत में गाय वन में ही चर रही होती थीं। वे एक दिन स्वयं वन में गए तो देखा की मस्तनाथ गो पालन में लगे है और गाँव वापस आते ही उन्हें वहीं देखा तो कुछ भी समझ में नहीं आया। सबला उन्हें साक्षात् गोरक्ष नाथ जी के अनुग्रह से प्राप्त समझ कर उनके प्रति अमित पूज्यभाव रखते थे और उनके हृदय में मस्तनाथ के प्रति आदर सात्विक स्नेह बढ़ता रहता था।

वैराग तथा योगी ब्रह्मण को अपने रूप से अवगत कराना
बारह साल की अवस्था होने पर मस्तनाथ के मन पर वैराग का रंग चढ़ने लगा। वे नदी तट पर वन में और तालाबके रमणीय किनारे-किनारे विचरण कर एकांत का सेवन करते हुए आत्मचिंतन में लग गए कभी-कभी किसी गुफा में बैठ कर शांतवृति में रमण करने लगते थे। वे इच्छाचारी मिताहारी और ब्रहमचारी के रूप में जीवन यापन में प्रवृत हुए। माता पिता ने उनके पालन पोषण और देख-रेख में किसी भी तरह की कमी नहीं रखी। मस्तनाथ के घर के ही समीप एक नैष्ठिक ब्राहमन निवास करते थे जप धियान आदि में लीन होकर वे भगवन का चिंतन किया करते थे। उन्हें मस्तनाथ ने अपनी योगविभूति का दर्शन कराया। उन्होंने जटा विभूति विभूषित गले में सेली आदि शोभित उनका युवा अवधूत वेश में दर्शन किया। साथ ही साथ उन्हें मस्तनाथ के दर्शन के अतिरिक्त अनेक योगियों का भी दर्शन होने लगा। ब्रह्मण ने यह बात उनके पिता से कही पिता मस्तनाथ के दिव्यस्वरूप में निष्ठावान थे उन्होंने उनसे (मस्तनाथ से) पूछा की ब्रह्मण को दर्शन देने वाले योगी कौन हैं। पिता ने दैवी सिद्धिसमपन्न मस्तनाथ जी की महिमा का अनुभव किया ।

गुरु दीक्षा
एक दिन उनके निवास पर आइपंथ के प्रसिद्ध संत नरमाई का आगमन हुआ पिता ने उनके चरण पर मस्तनाथ को अदृश्य विधान से समर्पित कर दिया। मस्तनाथ ने कहा की मुझे श्री नाथ जी की सेवा में समर्पित कीजिये में आपके शरणागत हूँ नरमाई ने कहा की परमेश्वर का चिंतन ही परम आवश्यकतत्व है विषयासक्त न रहने पर ही वास्तविक विरक्ति का उदय होता है नरमाई ने मस्तनाथ को २४ साल की अवस्था में संवत १७८८ वि. में योग मंत्र की दीक्षा देकर शिष्य रूप में स्वीकार किया। मस्तनाथ आई पंथ में दीक्षित होकर कुंडल धारण कर साधना में प्रवृत हो गए।

आई पंथ
आई पंथ का सम्बन्ध करकाई और भुसटाई पंथ से बताया गया है दोनों गोरक्ष नाथ जी के शिष्य थे। आई पंथ में आदि शक्ति-आई (माता मराठी भाषा में आई माता को कहते हैं) की पूजा करने से अनुयाइयों को आई पंथी कहा गया है। गोरक्षनाथ जी की शिष्या विमला को इस पंथ की मूल प्रवर्तिका मन गया है। नित्यान्हिक तिलक में विमला को मत्स्येन्द्र नाथ की अनुवर्तनी कहा गया है इसलिए यह संभावना पुष्ट होती है की विमला ने गुरु गोरक्ष नाथ जी से दीक्षा प्राप्त की है। मस्तनाथ जी के गुरु नरमाई जिन्द के कोट स्थान में उत्पन्न हुए थे मस्तनाथ जी के समय से आई पंथ के योगियों ने अपने नाम के साथ नाथ लगाना आरम्भ किया। नाथ योगी मस्तनाथ इस पंथ में एक सिद्ध पुरुष के रूप में प्रख्यात हुए।

बाबा मस्तनाथ जी का अस्थल बोहर आना और विकलांगों को ठीक करना।
योगिराज मस्तनाथ ने हरयाणा प्रदेश के बोहर से सटे वन को अपना तप:स्थल चुनाजिसकी प्राकृतिक रमणीयता और नीरवता से आक्रीष्ट होकर योगिराज चौरंगी नाथ ने पधार कर तप किया था। मस्तनाथ जी ने पंचाग्नि तप के लिए धूनी प्रज्वलित की। असंख्य दर्शनार्थी उनकी योगसिद्धि और तपस्या से प्रभावित होकर उमड़ पड़े। महाराज ने इसे योग साधना मैं बाधक समझ कर उसी वनस्थली से थोडा आगे स्थान पर तप करने करने का निश्चय किया अनेक लोग उनके दर्शन से सफल मनोरथ होने लगे उनके मार्गदर्शन से लोगों को स्वस्थता शांति और निर्भय की प्राप्ति हुई तपस्या की इस अवधि में एक पंगु नारी आई। लोगों ने उसकी कुरूपता की हंसी उड़ाई।महाराज के अनुग्रह से वह नारी सुंदर आकृति में बदल गई और उसकी पंगुता नष्ट हो गई। इसी तरह बोहर ग्राम के ही निर्भय शर्मा के पुत्र नाथूराम शर्मा को महाराज के दर्शन के लिए उपस्तिथ होने पर नेत्र ज्योति मिल गई। वह दिव्य दृष्टी से सम्पन्न हो उठा। अनेक विकलांग और अंगहीनो विकलांगता ठीक हो गई उनके अंग प्रत्यंग ठीक हो गए।

शिष्यों को पूर्व की घटना सुनना
योगिराज मस्तनाथ साक्षात तीर्थस्वरूप थे वे आत्मतीर्थ थे।यद्यपि उनके लिए तीर्थ भ्रमन की आवश्यकता न थी तथापि तीर्थों मैं उनकी उपस्तिथि से लोग अपने आपको मन वचन और शरीर से शुद्ध अनुभव करते थे उन्होंने एक वन की गुफा में तप के लिए प्रवेश किया। एक दिन जोर से अट्टहास किया शिष्यों ने कारण पुछा तो कहा की निकटस्थ गाँव में एक कर्कशा स्त्री रहती है। वे शिष्यों के साथ भिक्षाटन के लिए आये। वह स्त्री वस्त्र प्रक्षालन के लिए एक वर्तन में पानी गर्म कर रही थी उन्होंने उस कुम्हार की स्त्री से भिक्षा में एक घड़ा और स्थाली की याचना की उसने महाराज के सामने वर्तन को गर्म जल सहित भेज दिया। उनके शाप से शाप से पूरे का पूरा गाँव नष्ट हो गया।

शीलका को चमत्कार दिखाना
मस्तनाथ की तपस्या और जीवनवृत्ति योग के अमृत से रसमयी है। एक दिन महाराज मस्तनाथ सिद्धासन लगाकर वन मैं एक वृक्ष के निचे ताप में लीन थे की भालो ग्राम का शीलका नामक व्यक्ति उनकी सेवा में दूध ले आया और नित्य दूध लाकर बाबा की सेवा में लगा रहता था। महाराज ने उसे जंगली जानवरों से सावधान कर वन में आने से रोकना चाहा तो उसने कहा की मुझे चोरादी से तथा जंगली जन्वेरों से भय नहीं लगता। एक दिन महाराज ने उसके वस्त्र चोर के रूप में प्रकट होकर छीन लिए और उसका रूप बनाकर रात ही में उसकी माँ को वे वस्त्र वापस कर लौट आये। सवेरे शीलका ने घर पहुँच कर देखा की सारे वस्त्र घर पर हैं। माँ ने कहा की तुम्ही ने वस्त्र वापस किया है।सभी लोग महाराज की योग सिद्धी से चकित हो गए।

एक दिन आधी रात में पेड़ पर बैठ कर शीलका ने देखना चाहा की महाराज इस समय कहाँ जाकर अद्रिस्य हो जाते है उसने देखा की महाराज सिद्ध गन्धर्वों और योग सिद्धों के बीच में स्थित हैं और सभी लोग उनकी आरते कर रहे हैं। इस दृश्य को देखकर वह आश्चर्य में पड़ गया उसने महाराज से योगदिक्षा ली उसके पुत्र ने भी शिष्यत्व ग्रहण किया और पत्नी योगिनी हो गई शीलका को महाराज ने शील्कानाथ नाम प्रदान किया।

बाबा मस्तनाथ द्वारा योगराज को भर्तरिहरी और गोपीचंद का दर्शन कराना
उस वन से मस्तनाथ ने एक अत्यंत निर्जन वन मैं प्रवेश किया।यह वन खोखरा कोट के नाम से प्रसिद्ध है तथा अस्थल बोहर के वन का ही एक भाग है। इस पर उनके प्रिये शिष्य योगराज ने कहा की आप सब कुछ करने मैं समर्थ हैं। सिद्धियों के स्वामी हैं। मृत को जीवित करने वाले हैं और विरक्त को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। मेरी इच्छा है की मैं कालदंड का खंडन कर सिद्ध देह में विचरण करने वाले अमरकाय भर्तरिहरी और गोपीचंद का प्रत्यक्ष दर्शन करू। मस्तनाथ ने कहा की यद्यपि आत्मा अमर है तथा अपि योग्सिधान्त में आत्मा के साथ शारीर अमर हो जाता है भर्तरिहरी और गोपीचंद दोनों अमर हैं। मस्तनाथ जी के अनुग्रह से दुसरे दिन सवेरे योगराज को भर्तरिहरी और गोपीचंद का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ।

बाबा मस्तनाथ जी द्वारा सूखे वृक्ष को हरा करना और जाट को पुत्र प्राप्ति होना
मस्तनाथ जी ने पटियाला राज्य के उचाना ग्राम मैन्कुच समय तक निवास कर लोगों को योगोपदेश दिया सिद्धों की महिमा और योगसाधना प्रक्रिया से परिचित कराया। रोहतक मंडल में महम ग्राम के निकट घडी बढ़ी ग्राम में एक सूखे प्राचीन वट वृक्ष के निचे आसन लगाया।एक वृद्ध जाट धर्मात्मा पुरुष संतानहीनता से वह बहुत दुखी था उसकी स्त्री भी शरीर से जर्जर हो चली थी लोगों ने कहा की यदि यह सुखा वट वृक्ष हरा हो जाये तो जाट भी पुत्र की प्राप्ति कर सकता है महाराज के आदेश से शिष्यों ने वृक्ष के मूल मैं पानी डाला और वह हरा हो गया जाट ने उनके अनुग्रह से तीन वर्षों मैं तीन पुत्रों की प्राप्ति की।

पाई देवी को शाप देना
महाराज रोहतक मंडल के ही भालोट ग्राम से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित कलोई ग्राम मैं पहुँच गए। वहां कुईं पर पानी लेने आई हुई एक सुंदर नवजवान स्त्री ने अपनी सखिओं के साथ मिलकर मस्तनाथ जी के योगी वेश पर हास्यात्मक व्यंग किया वह हरिसिंह नामक व्यक्ति की पत्नी थी महाराज ने उसे शाप दिया की तू योगिनी होगी। उस स्थान को नीरस समझ कर महाराज ने निर्जन जीव जंतु के प्रवेश से अगम खोखर जंगल मैं निवास किया। घर जाने पर हरिसिंह की स्त्री पाई भूतावेश से ग्रस्त हो गई वह विकृति को प्राप्त हुई। उसके मन में वैराग का उदय हो गया वह अपने पति पुत्र आदि से सम्बन्ध विच्छेद कर तथा शरीर को भस्म विभूषित कर शिवगोरक्ष मन्त्र को स्मरण करती हुई उसने वन में प्रवेश किया। जब हरिसिंह को पता चला की यह मस्तनाथ के कोप का परिणाम है तो धनुष बाण लेकर उन्हें मारने चल पड़ा। महाराज आसन पर विराजमान थे अद्रिस्य हो गए कभी दीख पड़ते कभी अद्रिस्य हो जाते। हरिसिंह ने महाराज से क्षमा मांगी मस्तनाथ जी ने उसकी स्त्री को योगदीक्षा दी और यह पाई नाथ के नाम से महातपस्विनी योगिनी के रूप में प्रसिद्ध हो गई।

बाबा मस्तनाथ का मृग रूप धारण करना
खोखरा जंगल मैं ही योगिराज मस्तनाथ जी की कृपा से एक गोपालक की प्रार्थना से मृत गाय के शरीर मैं फिर से प्राण संचार हो गया। इसी प्रकार एक समय महाराज ने रोहतक के झज्जर ग्राम मैं आसन लगाया। महाराज की चरण धूलि से वह ग्राम पवित्र हो गया एक दिन वे छायादार वृक्ष के निचे विराजमान थे की एक सामंत आखेट के लिए उस वनस्थली मैं आया। महाराज ने मृग रूप धारण कर लिया। उसने महाराज पर बाण चलाया और मृग के स्थान पर उसने वट वृक्ष के निचे जटाजूट विभूषित योगी को देखा। महाराज के चरणों पर गिरकर उसने क्षमा मांगी महाराज ने उसे आत्मज्ञान से संबोधित किया।

बादशाह आलम को चमत्कार दिखाना
योगिराज मस्तनाथ ने अपनी चरणधूलि से दिल्ली को भी पवित्र किया था। बादशाह औरन्ग्जेब की धार्मिक कट्टरता से हिंदुत्व को भी आघात लगा था। उन दिनों दिल्ली के सिंघासन पर बादशाह आलम विराजमान था महाराज के दिल्ली पधारने से हिन्दुओं को बहुत आश्वासन मिला और महाराज ने उन्हें अभय दान दिया महाराज ने दिल्ली में पच कूईयां (पंच्कूपी) के समीप एक उद्यान मैं आसन लगाया शाह आलम उनका दर्शन करना चाहता था उसने महाराज के चरण-देश मैं शाल आदि बहुमूल्य पदार्थ उपहार मैं भेजे। महाराज ने कौतुक मैं ही उनको आग की धूनी मैं डाल दिया  बादशाह ने मंत्री भेजकर कहलवाया की जो वस्तुएं भेजी थीं वे आपके उपयोग मैं नहीं आयंगी उन्हें लौटा दें बदले में दूसरी वस्तु भेज रहा हूँ। महाराज ने धूनी में जले पदार्थ ज्यों के त्यों नवीन रूप में निकाल कर वापस कर दिए लोग उनकी योगसिद्धि से चकित हो गए। उन दिनों दिल्ली की स्थिति शोचनीय थी। गुलाम कादिर रूहेला ने शाह आलम को अँधा कर कैद में डाल दिया। १७८८ ई. में इस तरह दिल्ली असहाय हो गई। महाराज ने दिल्ली से प्रस्थान कर दिया।

पचोपा गाँव को शाप से नष्ट करना
दिल्ली से योगिराज पचोपा ग्राम आये। उस गाँव मैं देविदास नाम का एक व्यक्ति अपने तंत्र-मंत्रात्मक प्रयोग के लिए प्रसिद्ध था। उसने कहा की ऐसे अनेक योगी घुमते है इनमे सिद्धि नाममात्र को नहीं होती है उसने योगिराज की निंदा की महाराज मौन थे उन्होंने श्रद्धालुओं से सामान लेकर गाँव से बाहर जाने का आदेश दिया और कहा की यह गाँव आग लगने से शीघ्र ही जल उठेगा सिद्ध की वाणी थी। तत्काल सारा गाँव आग में प्रज्ज्वलित हो उठा।

कडाहे में काठ का टुकड़ा डलवाना और उसका स्वर्ण में बदलना
एक समय भ्रमण करते हुए योगिराज मस्तनाथ बीकानेर गए। उन दिनों महाराज गजसिंह के पुत्र सूरतसिंह बीकानेर के सिंघासन पर विराजमान थे। महाराज एक यज कर रहे थे उसमें दूर दूर के संत महात्मा साधू संत और विद्वान पधार रहे थे। यज्ञ के परिसर से ही महाराज मस्तनाथ अपने शिष्य रूप नाथ के साथ जा रहे थे की उन्होंने दूध से भरा कड़ाहा देखा उसमें उन्होंने विभूति और काठ का टुकड़ा प्रदान कर रूपनाथ को आदेश दिया की कड़ाहा में डाल दो। इससे यज्ञ क्षेत्र मैं बड़ा कोलाहल हुआ।

मस्तनाथ जी ने वन में आकर आसन लगाया राजा इस वृतांत से कुपित हुए और सिद्ध मस्तनाथ को लाने के लिए दूत भेजा। दूत ने कभी मस्तनाथ को देखा और कभी उनके स्थान पर सिंह देखा। राजा ने यह वृतांत जान कर उन्हें आदर पूर्वक राजमहल में बुलाया। उन्होंने महाराज से कडाह में विभूति और काठ का टुकड़ा डलवाने का कारन पूंछा तो योगिराज ने कहा की आप ब्राह्मणों को पायस का भोजन करा रहे थे तो दक्षिणा मैंने देना उचित समझा। कडाह मंगवाया तो उसमें स्वर्ण भरा हुआ था। राजा सूरत सिंह ने महाराज से नाथ योग की दीक्षा ग्रहण की और सेवा में एक ग्राम देना चाहा पर महाराज ने अस्वीकार कर दिया। उनके शिष्य तोतानाथ प्रसिद्ध हुए और सूरत सिंह ने सेवा में एक ग्राम थेडी नामक प्रदान कर बोहर मठ के अधिकार में कर दिया।

रूप नाथ की स्त्री को स्वर्ण से भरा मतीरा देना
रूपनाथ की विवाहिता स्त्री जो उनके शिष्य होने के पहिले विवाहिता थी महाराज का दर्शन करने आई जीविका के लिए महाराज ने मतिरा दिया जो बहुमूल्य मोतियों से परिपूर्ण था। महाराज ने उसकी चिंता नष्ट कर दी।

बाबा मस्तनाथ जी द्वारा राजा मानसिंह को राजा बनाना
महायोगी जलंधरनाथ के कृपापात्र जोधपुर के महाराज मानसिंह को राज्य अधिकारी बनाने में उनके समकालीन योगिराज मस्तनाथ का ही विशेष योगदान था क्यूंकि जालान्धरनाथ के प्रति महाराज के हृदय में श्रद्धा रही होगी लेकिन विशेष रूप से नाथयोगी और नाथ सम्प्रदाय के प्रति उनमें श्रद्धा निष्ठा की जाग्रति मस्तनाथ जी के अनुग्रह के रूप मैं ही स्वीकृत है। मानसिंह के भाई भीम सिंह बहुत कठोर हृदय के थे। उन्होंने मानसिंह को जालोर दुर्ग मैं बंदी बनाकर जोधपुर के राज्य पर अधिकार कर लिया था।

मस्तनाथ ने जोधपुर पहुँच कर एकांत मैं आसन लगाया। मानसिंह के दूत के रूप में एक कुंडलधारी दर्शनी योगी ने भीमसिंह को सूचित किया की मानसिंह की रक्षा करने के लिए एक सम्रर्थ योगी आ गए हैं। वे सिद्ध हैं मृतक को जीवन दान देने वाले हैं साथ ही साथ महाराज ने योगबल से भीमसिंह के किसी मुख्य सैनिक को मानसिंह के पास भेजा की भीमसिंह सात दिनों के भीतर राज्य पर अधिकार कर लेंगे आप खजाना सुरक्षित कर राज्य के बहार निकल जाएये। मानसिंह चिंतित हो उठे। उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी की आप तीसरे दिन जोधपुर के राजा बन जायेंगे। मानसिंह ने कहा की यह कहने वाले आप कौन हैं जालंधर नाथ हैं मत्स्येंदर नाथ हैं या गोरक्षनाथ हैं हमें दर्शन दीजीये। आप मस्तनाथ तो नहीं हैं मस्तनाथ प्रकट हो गए महाराज ने कहा की इस कोट मैं एक कूप है उसका जल पीजीए एक अन्न का भंडार है सारी सेना की इसी से तृप्ति हो जाएगी।

मस्तनाथ अंतर्ध्यान हो गए। उसके बाद मस्तनाथ ने मंदिर मैं प्रकट होकर जलंधरनाथ के पूजक देवनाथ से कहा की भीम सिंह स्वयं मृत हो जायेगा मानसिंह से कहना चाहिए भीमसिंह के मरने पर मानसिंह मस्तनाथ जी के अनुग्रह पर जोधपुर के राजसिंघासन पर आसीन हो गए। सम्पूर्ण राज्य की मानसिंह ने श्रीनाथ जी की धरोहर के रूप मैं स्वीकार किया और मस्तनाथ जी को आदर पूर्वक राजमहल मैं पधारवा कर उनसे धर्म और योगतत्त्व का उपदेश प्राप्त किया। मानसिंह नाथ योग के अद्भुत मर्मज्ञ थे। उनकी श्रीनाथतीर्थावाली रचना विशेष रूप से नाथ सम्प्रदाय मैं सम्मानित है। विवेकमार्तनड के टीकाकार तथा उन्ही के समकालीन और कृपापात्र भीष्म भट्ट ने मानसिंह को सिद्धसिद्धांतत्तत्वज्ञ और श्रीनाथपदामभोजमधुप कह कर सम्मानित किया है। जोधपुर राज पुस्तकालय के एक भाग के रूप में नाथ सम्प्रदाय परक अगणित पुस्तकों का भंडार महाराज मानसिंह की देन है।

बाबा मस्तनाथ जी के शिष्य और उनको दिया उपदेश
सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी की शिष्य परम्परा बड़ी समृद्ध है। उनके शिष्य घडी नाथ धाता और रनपत तथा तोता नाथ आदि के नाम विशेष सम्मानित हैं। तोता नाथ भरतपुर क्षेत्र के पिगोरा ग्राम के रहने वाले थे महाराज का उन पर विशेष अनुग्रह था। बीकानेर राज्य से प्राप्त थेडी ग्राम महाराज ने तोतानाथ को देखभाल के लिए सोंपा था। मस्तनाथ जी ने शिष्यों को उपदेश दिया की आत्मतत्व का ज्ञान प्राप्त करना ही योगसाधना का फल है। व्यव्हार-मार्ग का त्याग नहि कारना चाहिए। सदाचार परक व्यव्हार की सिद्धि में ही परमार्थ सन्निहित है। उन्होंने कहा की आत्मतत्व साकारस्वरूप मायावश सातिशय होता है । वास्तव मैं वह निरतिशय निर्गुण है।

बाबा मस्तनाथ जी का महाप्रस्थान
एक समय बाबा मस्तनाथ जी महाराज बीघडान गाँव में विराजमान थे। उन्होंने बात ही बात में शिष्य मंडली से अपने महाप्रस्थान की बात बताई की फाल्गुन शुक्ल पक्ष में यह यात्री स्वधाम चला गायेगा। महाराज शिष्यों को उपदेश दे रहे थे की वार्ता के मध्य में अमरकाया सिद्ध योगिराज चौरंगी नाथ ने आकर भेंट की परस्पर में बातचीत कर अंतर्ध्यान हो गए। योगिराज मस्तनाथ ने पूरे सौ साल की अवस्था में संवत १८६४ वि. की फाल्गुन शुक्ल नौमी को निर्वाण प्राप्त किया।

महाराज ने दिव्या देह से प्रकट हो कर आकाश से कहा में जीवीत हूँ मृत नहीं हूँ। स्थूल देह मात्र से ही मेरा सम्बन्ध विच्छेद हुआ है । अत्यंत सादे ढंग से जमीन में गुफा बनाकर उसमें मेरे शरीर को समाधी दी जायउनके आदेश से शरीर को बीघडान गाँव से अस्थल बोहर लाया गया और चौरंगी नाथ जीकी स्थली में ही उन्हें समाधी दी गई। उनके शिष्य तोता नाथ जी ने सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी के समाधी स्थल पर एक मंदिर का निर्माण कराया। मस्तनाथ जी के समाधी स्थल पर फाल्गुन शुक्ल नौमी को प्रत्येक वर्ष मेला लगता है। अस्थल बोहर का कण कण उनकी योगसिद्धि का परिचायक है। योगिराज मस्तनाथ अमर हैं उनकी पवित्र कीर्ति अमर है।
आदेश आदेश आदेश

Tuesday, 13 December 2011

योगिराज श्रीयुत महंत चांदनाथ जी योगी

महान कर्मयोगी  योगिराज श्रीयुत महंत चांदनाथ जी योगी 
जिनके चरण कमल का स्मरण सम्पूर्ण बिघन समूह को  नस्ट कर देता है मै सरस्वती का ध्यान लगा कर तथा सिद्ध योगी बाबा मस्तनाथ जी का स्मरण कर सिद्ध बाबा मस्तनाथ स्वरूप  योगीसिद्ध बाबा महंत  चाँद नाथ जी योगी की जीवन  लीला का संछिप्त  वर्णन आप लोगों के सामने कर रहा हूँ , भगवान गणेश माँ सरस्वती  मेरे इस छोटे से परयाश को सफल करें |
पूज्य महंत चांदनाथ योगी जी - जन्म एवम शिक्षा 
दिल्ली के बेगमपुर गाँव मैं पिता श्री मोहर सिंह तथा माता श्रीमती चंपा देवी के संपन्न किसान परिवार मैं २१ जून १९५६ मैं एक दिव्या बालक का जन्म हुआ | सात भाई बहिनों मैं सबसे बड़े बालक की बुद्धि बचपन से ही कुशाग्र थी वह धर्म कर्म मैं रुचि रखने वाला तथा तेजस्वी था |इस बालक का नाम इनके माता पिता ने चाँद राम रखा | वही बालक बड़ा होकर महंत चाँद नाथ जी के नाम से जाना गया | जिसने अपनी विशिष्ट कार्य शैली एवम विशिष्ट व्यक्तित्व के द्वारा श्री बाबा मस्तनाथ जी की परम्परा को आगे बढाया एवम मठ का संरक्षक बना | 
महंत चाँद नाथ जी ने हिन्दू कॉलेज दिल्ली से बी.ए. (आनर्ष) की उपाधि प्रथम श्रेणी मैं प्राप्त की , स्नातक के पश्चात् २१ जनवरी १९७८ महा चौदस के दिन महंत श्रेयोनाथ जी से दीक्षा ग्रहण की तथा उनके आदेश अनुसार थेहडी हनुमानगढ़ जाकर वहां का कार्य भार संम्भाला तथा ७ जनवरी १९८५ तक वे इसी क्षेत्र मैं कार्य करते रहे उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा भी डॉक्टर की मानद उपाधि प्रदान की गई |

मेरे गुरुदेव की शिक्षा ओउर उपलब्धियां -
गुरुदेव सिद्ध बाबा महंत चाँद नाथ जी योगी 
  • २१ जून १९५६ मैं गाँव बेगमपुर मैं जन्म|
  • १९७७ मैं बी ए (आनर्स ) की उपाधि |
  • २१ जन १९७८ नाथ सम्प्रदाय की दीक्षा | 
  • २१ मई १९८४ रस्म चादर प्रक्रिया |
  • ३० मई १९८४ को कानूनन वसीयत |
  • ९ जन १९८५ गद्दी नशीन महंत |
  • १९८६ मैं गुरु समाधी स्थल का निर्माण |
  • १९८७ मैं सिविल रोड पब्लिक स्कूल |
  • १९८८ मैं आवासीय पब्लिक स्कूल |
  • १९८९ मैं बाबा मस्तनाथ सभागार |
  • १९९० मैं शिव मंदिर की स्थापना |
  • १९९१ मैं  प्राचीन शिव मंदिर का जीर्णोधार |
  • १९९२ मैं थेहडी डेरा मंदिर |
  • १९९३ मैं  चक ७ एल एल का निर्माण |
  • १९९४  मैं बद्री नाथ धर्मशाला निर्माण |
  • १९९५ मैं एम् बी ए कॉलेज की स्थापना |
  • १९९६ मैं फार्मेसी एवम डी एड कॉलेज |
  • १९९७ मैं डेंटल कॉलेज जी स्थापना |
  • १९९८ मैं फिजीयोथेरेपी एवम मॉडर्न साइंस|
  • १९९९ मैं संस्कृत कॉलेज की  स्थापना |
  • २००० मैं नर्सिंग कॉलेज की स्थापना |
  • २००१ मैं कन्या छात्रावास की स्थापना |
  • २००२ मैं सिद्ध बाबा रणपत मान्धाता समाधी स्थल का निर्माण |
  • २००३मैं  रैबारी धर्मशाला का निर्माण |
  • २००४ मैं  शिक्षा रतन एवम बहरोर बिधायक |
  • २००५ मैं  चिकितसा रतन एवम छात्रावास न. २ | 


गुरु की याद मैं 
पूज्य महंत श्रेयोनाथ जी की स्मृति में महंत चाँद नाथ जी द्वारा श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया गया जिसमें  अनेक साधू संत महंत एवम भक्त जनों पूज्य महंत जी को  श्रद्धांजलि अर्पित की तथा उन्हें कम्बल भेंट कर परम्परानुसार दक्षिणा दी गई |
गुरु की स्मृति में २१ से २३ जनवरी १९८६ त्रयोदशी ,चतुर्दशी पौष शुक्ल पूर्णिमा के के दिन एक विशाल सम्मलेन का आयोजन किया गया | जिसमें अनेक संतों ने अपने विचार रखे |
गुरु के पदचिन्हों पर 
गुरु के द्वारा प्राप्त ज्ञान को कर्म रूप में प्रस्तुत करना गुरु की सच्ची आराधना है वर्तमान में श्री बाबा मस्तनाथ मठ  के महंत चांदनाथ जी ने अपने गुरु की आराधना में गुरु के कार्यों को विस्तृत रूप देकर पूर्ण किया महंत श्रीयोनाथ जी द्वारा प्रारंभ किये गए चिकित्सकीय एवम जनोपयोगी कार्यों को विस्तृत एवम आधुनिक रूप प्रदान किया |
श्री युत श्रेयोनाथ जी द्वारा स्थापित श्री बाबा मस्तनाथ धर्मार्थ नेत्र चिकित्स्यालय तथा श्री बाबा मस्तनाथ सामान्य चिकत्सालय का आधुनिकीकरण कर विशिष्ट रूप प्रदान किया | धर्मार्थ नेत्र चिकित्स्यालय में न सिर्फ रोगियों की सामान्य नेत्र चिकित्सा की जाती है - अपितु आत्याधुनिक विधियों द्वारा नेत्र प्रत्यारोपण , लेज़र चिकित्सा तथा नेत्र संग्रहण जैसी सुबिधायें भी ऊपलब्ध हैं |
गुरु द्वारा स्थापितश्री बाबा मस्तनाथ धर्मार्थ सामान्य चिकित्सालय ने भी आज अपने विशाल रूप को प्राप्त कर लिया है | यहाँ न सिर्फ एलोपेथिक चिकित्सा की बिभिन्न आधुनिक शैलियों के द्वारा चिकित्सा की जाती है अपितु आयुर्वेद चिकित्सा को भी विशिष्ट रूप प्रदान कर रोगियों को रोग मुक्त किया जाता है | इस चिकित्सालय को आधुनिक रूप प्रदान करना महंत चाँद नाथ जी की ही उपलब्धि है |
श्रीयुत श्रेयोनाथ जी द्वारा स्थापित आयुर्वेदिक महाविद्यालय  का आधुनिकीकरण ,नवीन आधुनिक पुस्तकालय का निर्माण , आधुनिक पौधशाला का निर्माण चिकित्सकीय जड़ी -बूटियों पर नवीन अनुशंधान एवम आधुनिक रसायन शाला का निर्माण महंत चांदनाथ जी के ही प्रयाशों का ही फल है |
महंत जी ने श्री बाबा मस्तनाथ मैथ अस्थल बोहर क्षेत्र के चारों ऑर चार दीवारी का निर्माण कराकर मठ को नवीन रूप प्रदान किया ताकि मठ की गरिमा को मर्यादित किया जा सके | योगिराज चाँद नाथ जी ने न सिर्फ क्षतिग्रस्त प्राचीन भवनों का नवीनीकरण एवम पुनरुद्धार कराया अपितु सौन्दर्यीकरण की ऑर भी विशेष ध्यान दिया|  
गुरु के समाधी स्थल का निर्माण 
अपने गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा स्नेह के कारण एवम उनकी स्मृतियों को संजोये रखने  के लिए महंत चाँद नाथ जी योगी जी ने अपने पूज्य गुरु महंत श्रेयोनाथ जी के समाधी स्थल का श्री बाबा मस्तनाथ जी के समाधी स्थल के समीप निर्माण कराया जहाँ अखंड ज्योत हमेशा प्रज्ज्वलित रहती है | इसका निर्माण कार्य सन १९८६ मैं शुरू हुआ तथा सफ़ेद मकराना पत्थर से सुशोभित इस समाधी की छटा देखते ही बनती है यह वास्तु कला का एक उत्कृष्ट एवम अनुपम नमूना है |


ज्ञान वृक्ष का विस्तार 
वृक्षों की जड़ें जितनी गहरी होती हैं वृक्ष उतना ही विस्तृत होता है | पूजनीय महंत चाँद नाथ जी योगी ने अपने गुरु श्री श्रेयोनाथ जी द्वारा रोपे गए वृक्ष की जड़ों का सिंचन किया और नवीन ज्ञान वृक्षों का रोपण किया | यह ज्ञान वृक्ष न सिर्फ हरयाणा वासिओं को अपितु सम्पूर्ण देश के ज्ञान उपासकों को ज्ञान का रसास्वादन करवा रहा है |
महंत चाँद नाथ जी ने नवीन ज्ञान वृक्षों का रोपण कर उन्हें संस्थान का रूप प्रदान किया जिसे आज श्री बाबा मस्तनाथ शिक्षण संस्थान के रूप से जाना जाता है |इस ज्ञान संस्थान में अनेक महाविद्यालय एवम चिकित्सालय हैं जो न सिर्फ ज्ञान के अपितु सेवा के भी केंद्र है 
वास्तुकला  प्रेमी 
गुरु गुड ही रहे चेला शक्कर हो गया इस कहावत को चरितार्थ करते हुए महंत चाँद नाथ जी योगी ने जीर्ण शीर्ण मंदिरों का पूर्णोद्धार एवम नवीनीकरण आधुनिक वास्तुकला के आधार पर करवाया | मठ के बीचों बीच बना हठयोगी  रनपतनाथ  मान्धातानाथ जी के समाधी स्थल को नवीन रूप देकर २ करोड़ की लागत से राजस्थान से लाए गए पत्थरों द्वारा इसे स्मृति स्थल बनाकर विशिष्ट रूप प्रदान किया गया |
मस्तनाथ शिक्षण संस्थान मैं बना उत्तर भारत का विशाल एवम विशिष्ट सभागार जहाँ १२०० व्यक्तियों के बैठने की व्यवस्था है तथा जो पूर्णतया वातानुकूलित है महंत जी की उच्च आकांक्षाओं का प्रतीक है यहाँ पर लगी स्क्रीन , प्रोजेक्टर आदि सभी आधुनिक संयंत्रों द्वारा संचालित हैं |  
गौशाला का निर्माण 
मठ क्षेत्र मैं स्थित यह गौ शाला गायों के प्रति महंत जी के स्नेह का द्योतक है यहाँ पर लगभग ५०० गायें हैं | यहाँ सभी गायों की समय समय पर चिकित्सा जाँच की जाती है तथा उनके चारे एवम जल की समुचित  व्यवस्था की गई है 
नाथ साहित्य प्रेमी एवम संरक्षक 
योगी गुरु महंत चाँद नाथ जी को साहित्य से अत्यंत लगाव रहा है तथा वे नाथ परम्परा के साहित्य संरक्षक की भूमिका का निर्वहन कर रहे है | नाथ रहस्य ,नाथ सिद्धों की शंखाढाल , बाबा मस्तनाथ चरित , दिव्य भूमि मठ अस्थल बोहर तथा मेरे पूज्य गुरु देव आदि गुप्त एवम विल्लुप्त होते साहित्य ग्रंथों का काया कल्प कर उन्हें प्रकाश लेन का श्रेय महंत चाँद नाथ जी को जाता है | हरयाणवी कैसट एवम सीडी के माध्यम से बाबा मस्तनाथ चरित्र का रूपांतरण करवाने का श्रेय श्री बाबा योगी महंत चाँद नाथ जी को ही जाता है |
 
 

Friday, 9 December 2011

शिव पंचाक्षर स्त्रोत

 

शिव पंचाक्षर स्त्रोत

 
नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय|
नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे "न" काराय नमः शिवायः॥
हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन आप भष्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र सामान धारण करने वाले दिग्म्बर शिव, आपके न् अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार ।
मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय|
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे "म" काराय नमः शिवायः॥
चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार पर्वत एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त्य पुष्पों द्वारा पुजित हैं। हे म् स्वरूप धारी शिव, आपको नमन है।

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय|
श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवायः॥
हे धर्म ध्वज धारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के कमल मुख को सूर्य सामान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपको नमस्कार है।

वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय|
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवायः॥
देवगणो एवं वषिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वार पुजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र सामन हैं। हे शिव आपके व् अक्षर द्वारा विदित स्वरूप कोअ नमस्कार है।

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय|
दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै "य" काराय नमः शिवायः॥
हे यज्ञस्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य अम्बर धारी शिव आपके शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कारा  है।

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत शिव सन्निधौ|
शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
जो कोई शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य ध्यान करता है वह शिव के पून्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुख पुर्वक निवास करता है।

शिवमानसपूजा


आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानस पूजा शिव की एक अनुठी स्तुति है। यह स्तुति शिव भक्ति मार्ग के अतयंत सरल पर साथ ही एक अतयन्त गुढ रहस्य को समझाता है। शिव सिर्फ भक्ति द्वारा प्रापत्य हैं, आडम्बर ह्की कोई आवश्यकता नहीं है। इस स्तुति में हम प्रभू को भक्ति द्वारा मानसिक रूप से तैयार की हुई वस्तुएं समर्पित करते हैं। हम उन्हे रत्न जडित सिहांसन पर आसिन करते हैं, वस्त्र, भोज तथा भक्ति अर्पण करते हैं; पर ये सभी हम भोतिक स्वरूप में अपितु मानसिक रूप में करते हैं। इस प्रकार हम स्वयं को शिव को शिव को समर्पित कर शिव स्वरूप में विलिन हो जाते हैं।


रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ..१..
हे दयानिधे, हे पशुपते, मैंने आपके लिए एक रत्नजड़ित सिहांसन की कल्पना की है, स्नान के लिए हिमालय सम शीतल जल, नाना प्रकार के रत्न जड़ित दिव्य वस्त्र, तथा कस्तुरि, चन्दन, विल्व पत्र एवं जुही, चम्पा इत्यादि पुष्पांजलि तथा धूप-दीप ये सभी मानसिक पूजा उपहार ग्रहण करें।

सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् .
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ..२..
हे महादेव, मैंने अपने मन में नवीन रत्नखण्डों से जड़ित स्वर्ण पात्रों में धृतयूक्त खीर, दुध एवं दही युक्त पाँच प्रकार के व्यंजन, रम्भा फल एवं शुद्ध मीठा जल ताम्बुल और कर्पूर से सुगन्धित धुप आपके लिए प्रस्तुत किया है। हे प्रभू मेरी इस भक्ति को स्वीकार करें।

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलम्
वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा .
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ..३..

हे प्रभो! मैंने सकंल्प द्वारा आपके लिए एक छ्त्र, दो चंवर, पंखा एव निर्मल दर्पन की कल्पना की है। आपको साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए, तथा विणा, भेरि एवं मृदङ्ग के साथ गीत, नृत्य एव बहुदा प्रकार की स्तुति प्रस्तुत करता हूँ। हे प्रभो! मेरी इस पूजा को ग्रहण करें।

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः .
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् .. ४..
हे शम्भों ! आप मेरी आत्मा हैं, माँ भवानी मेरी बुद्धी हैं, मेरी इन्द्रियाँ आपके गण हैं एवं मेरा शरीर आपका गृह है। सम्पुर्ण विषय-भोग की रचना आपकी ही पूजा है। मेरे निद्रा की स्थिति समाधि स्थिति है, मेरा चलना आपकी ही परिक्रमा है, मेरे शब्द आपके ही स्तोत्र हैं। वास्त्व में मैं जो भी करता हूँ वह सब आपकी आराधना ही है।

करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा .
श्रवणनयनजं वा मानसंवापराधम् .
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व .
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो .. ५..
हे प्रभो! मेरे हाथ या पैर द्वारा, कर्म द्वारा, वाक्य या स्रवण द्वारा या मन द्वारा हुए समस्त विहित अथवा अविहित अपराधों को क्षमा करें। हे करूणा मय महादेव सम्भों आपकी सदा जय हो।

.. इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता..

Thursday, 8 December 2011

नटराज स्तुति

 

 

नटराज स्तुति

 

शिव परं ब्रह्म जगत सृजनकर्ता एवं  जगत गुरु हैं| शिव का तांडव प्रसिद्ध है| शिव के आनद तांडव के साथ ही सृजन का आरंभ होता है एवं रौद्र तांडव के साथ ही सम्पूर्ण विश्व शिव में पुनः समाहित हो जाते हैं|
नटराज शिव के जगत गुरू स्वरूप का भी परिचायक है| नृत्य कलाओं में श्रेठ गिना जाता है और नटराज शिव कलाओं एवं ज्ञान प्रदान करने वाले परं गुरु हैं.
नटराज स्तुति उन्ही जगत गुरु, परं ब्रह्म शिव को समर्पति है |


सत सृष्टि तांडव रचयिता
नटराज राज नमो नमः|

हे नटराज आप ही अपने तांडव द्वारा सृष्टि की रचना करने वाले हैं| हे नटराज राज आपको नमन है|

हे आद्य गुरु शंकर पिता
नटराज राज नमो नमः|
natraaj
हे शंकर आप ही परं पिता एवं आदि गुरु हैं. हे नटराज राज आपको नमन है|

गंभीर नाद मृदंगना धबके उरे ब्रह्मांडना
नित होत नाद प्रचंडना
नटराज राज नमो नमः|
हे शिव, ये संपूर्ण विश्व आपके मृदंग के ध्वनि द्वारा ही संचालित होता है| इस संसार में व्याप्त प्रत्येक ध्वनि के श्रोत आप हे हैं| हे नटराज राज आपको नमन है |

सिर ज्ञान गंगा चंद्र चिद ब्रह्म ज्योति ललाट मां
विष नाग माला कंठ मां
नटराज राज नमो नमः|

हे नटराज आप ज्ञान रूपी चंद्र एवं गंगा को धारण करने वाले हैं, आपका ललाट से दिव्या ज्योति का स्रोत है| हे नटराज राज आप विषधारी नाग को गले में धारण करते हैं| आपको नमन है|

तवशक्ति वामे स्थिता हे चन्द्रिका अपराजिता |
चहु वेद गाएं संहिता
नटराज राज नमो नमः|
हे शिव (माता) शक्ति आपके अर्धांगिनी हैं, हे चंद्रमौलेश्वर आप अजय हैं. चार वेदा आपकी ही सहिंता का गान करते हैं. हे नटराज राज आपको नमन है |